Wednesday, 23 June 2010

बराचुक्की का बिजलीघर....

यही हैं बराचुक्की का बिजलीघर....
१९०६ में रोशन किया था एक शहर...
आज भी खड़ा हैं पहाड़ों के अन्दर...
बेंगलुरु जो एशिया का पहला शहर....

Tuesday, 22 June 2010

भीड़ में कई ल़ोग खड़े हैं...


भीड़ में कई ल़ोग खड़े हैं...
कुछ ल़ोग मन पे अड़े हैं...
भीड़में भी सन्नाटा छाया हैं.....
हर तरफ मनका  शोर पाया हैं..
सन्नाटेमें ही शोरकी जड़ें हैं...
भीड़ में कई ल़ोग खड़े हैं...

Saturday, 29 May 2010

गुलाबी गुलदस्ता....

दिलके गुलदस्तें में फुलोंको युहीं सजाकर ....
जब भी  याद  आती एक फूल तोड़कर....
फेकना हमारी तरफ ज़रा गालोंमें हँसाकर...
बता देना क्या मीला गुल्दास्तेसे सर फोड़कर ....

Sunday, 16 May 2010

बुढा हो गया पुल...

बुढा हो गया पुल जीवन का बोझ लेकर....
खड़ा हैं अब भी  ओ  कंकाल का बोझ लेकर.....
जवानी में कितना काम किया होगा....
दिन रात लोगों को साथ दिया होगा....
अब जीता हैं खुद का भारी बोझ लेकर.....
बुढा हो गया पुल जीवन का बोझ लेकर....

Sunday, 28 March 2010

बीस्तर बेचते हैं हम...

नींद नहीं , बल्कि बिस्तर बेचते हैं हम।
इनका कहना, नींदही बेचते हैं हम।
हमें बिस्तर से कोई मतलब नहीं,
बिनबीस्तरही चैन की नींद सोते हैं हम।
नींद नहीं, बल्कि बीस्तर बेचते हैं हम।

Sunday, 14 February 2010

पानी का झरना.


पहाडोंसे उतरकर नदी में मिलना,
बूंद बूंद पानी  से बना यह झरना.
नाचते  हुए  पहाड़  से उतरना.
और नदीकी रूप में  समा जाना.
बूंद बूंद पानी से बना यह झरना  

Sunday, 17 January 2010

यही हैं प्यार....

देख यह संसार,
माँ बेटेका प्यार..
बच्चे को सिनेसे लगाकर ,
रखता हैं बन्दर..
यही हैं प्यार,
इंसान हो या बन्दर..

Friday, 8 January 2010

सामनेवाली खिड़की....

मेरे सामने वाली खिड़की से
एक तालाब का टुकडा दीखता हैं .
उसमे कभी सूरज तो कभी चाँद
का मुखड़ा दीखता हैं.

Sunday, 3 January 2010

जीवन एक यात्रा...

जीवन के सफ़र में,
ट्रेन के इंतज़ार में
बेचैन हैं एक और
मकाम की तलाश में
अपनों से मिलने की आस में

Wednesday, 23 December 2009

पढने दो इसे खुद भी पढो...

नन्ने  मुन्ने बच्चे,बंद कर तेरी मुट्ठी...
एक दिन स्कूल की भी होगी छुट्टी...
अभिभावक ज़रा करो इसकी कदर...
न लगे उसके खेल कूद को नज़र...
किस्मत में इसे मत छोडो...
पढने दो इसे खुद भी पढो...